संवाद 2026: एआई के दौर में शिक्षा की चुनौतियां और नई संभावनाएं
देहरादून में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), शिक्षा और भविष्य के रोजगार के मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। इस पैनल चर्चा में वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर और ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (सीटीओ) तेजस्वी घनशाला ने हिस्सा लिया। दोनों विशेषज्ञों ने शिक्षा जगत में तकनीक के बढ़ते प्रभाव और इससे जुड़ी चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
पैनल चर्चा के प्रमुख विषय
इस सत्र में शिक्षा प्रणाली पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव, भविष्य के रोजगार के अवसर, नई तकनीकों के साथ बदलती कौशल आवश्यकताओं और उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का भविष्य तकनीक के साथ तालमेल बिठाने में ही निहित है।
तेजस्वी घनशाला: शिक्षकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती
ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के सीटीओ तेजस्वी घनशाला ने कहा कि आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों के लिए एआई को अपनाना है। उन्होंने बताया कि छात्र पहले ही एआई टूल्स का इस्तेमाल अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कर रहे हैं। चाहे वह चैटजीपीटी हो या कोई अन्य उपकरण, बच्चे इनका उपयोग करके अपना काम आसान बना रहे हैं।
घनशाला ने कहा, “बच्चे पहले ही एआई को अपना चुके हैं। वे इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कर चुके हैं क्योंकि यह उनके काम को सरल बनाता है। लेकिन शिक्षकों में अभी भी इसे लेकर हिचकिचाहट है। मेरा मानना है कि शिक्षक जितनी जल्दी इस तकनीक को अपनाएंगे, उतनी ही तेजी से हम आगे बढ़ सकेंगे।” उन्होंने शिक्षकों को इस डिजिटल बदलाव के लिए तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. तृप्ता ठाकुर: अवसर और खतरे दोनों हैं साथ
डॉ. तृप्ता ठाकुर ने एआई को लेकर एक संतुलित दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा कि विज्ञान जब भी आता है, तो वह अवसर और खतरा दोनों लेकर आता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने परमाणु ऊर्जा का जिक्र किया, जो एक तरफ ऊर्जा का बड़ा स्रोत है, वहीं दूसरी तरफ परमाणु हथियार कितने खतरनाक हो सकते हैं।
उन्होंने बच्चों को स्मार्टफोन देने की उम्र को लेकर भी चिंता जताई। डॉ. ठाकुर ने कहा, “हर बच्चे के हाथ में एक निश्चित उम्र से पहले स्मार्टफोन नहीं आना चाहिए। यह माता-पिता और समाज सभी को ध्यान रखना होगा। ब्रिटेन और यूरोप सहित कई देशों ने 16 वर्ष की उम्र से पहले स्मार्टफोन के इस्तेमाल को सीमित किया है।”
एआई के शैक्षणिक उपयोग पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह उपकरण शिक्षा में क्रांति लाएगा। आज कोई भी छात्र अपने विषय के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक से ऑनलाइन पढ़ना चाहेगा। अगर किसी विषय का बेहतरीन शिक्षक ऑनलाइन उपलब्ध है, तो हर कोई उससे सीखना चाहेगा।
भविष्य में एआई विशेषज्ञों की मांग बढ़ेगी
डॉ. तृप्ता ठाकुर ने भविष्य के रोजगार बाजार पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में उन लोगों की मांग बढ़ेगी जो एआई को समझते हुए काम कर सकते हैं। एआई हमारे लिए एक साधन बनेगा, न कि प्रतिस्थापन।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार इस दिशा में काम कर रही है कि एआई के नैतिक पहलुओं को कैसे जोड़ा जाए और इसे कैसे नियंत्रित किया जाए। उनके अनुसार, शिक्षा संस्थानों को अब अपने पाठ्यक्रम में एआई और डिजिटल साक्षरता को शामिल करना होगा, ताकि छात्र भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकें।
शिक्षा में तकनीकी बदलाव की जरूरत
पैनल चर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि शिक्षा प्रणाली को अब पारंपरिक तरीकों से हटकर तकनीकी रूप से अधिक सशक्त बनाने की जरूरत है। शिक्षकों को न केवल एआई टूल्स का उपयोग करना सिखाया जाए, बल्कि उन्हें यह भी समझाया जाए कि वे इन तकनीकों का उपयोग कैसे अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं।
दोनों विशेषज्ञों ने माना कि एआई शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएगा, लेकिन इसके लिए शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों को मिलकर काम करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तकनीक को अपनाने में देरी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो लोग इसे जल्दी अपनाएंगे, वे ही भविष्य में सफल होंगे।