सम्वाद 2026: एआई के युग में हर विद्यार्थी को इन चार सवालों के जवाब पता होने चाहिए
लखनऊ में आयोजित सम्वाद 2026 कार्यक्रम के दूसरे दिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और शिक्षा के बदलते परिदृश्य पर गहन चर्चा हुई। इस मौके पर स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ के डीन प्रो. मनोज कपिल ने कहा कि आने वाले समय में एआई दुनिया के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा। ऐसे में युवाओं और बच्चों के लिए यह आवश्यक है कि वे न सिर्फ एआई के बारे में जानें, बल्कि इसके सही और संतुलित उपयोग को भी समझें।
चार सवाल जो हर छात्र के मन में स्पष्ट होने चाहिए
प्रो. कपिल ने बताया कि बच्चों को एआई के संबंध में चार मूलभूत प्रश्नों के उत्तर हमेशा याद रखने चाहिए। ये सवाल तकनीक के जिम्मेदार उपयोग की नींव रखते हैं:
- एआई का उपयोग कैसे करना चाहिए? – इसका मतलब है कि छात्रों को एआई टूल्स को संचालित करने की सही विधि पता होनी चाहिए।
- एआई का कितना उपयोग करना चाहिए? – अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए इसकी सीमा तय करना जरूरी है।
- एआई का उपयोग कब करना चाहिए? – सही समय पर तकनीक का इस्तेमाल करना सीखना चाहिए।
- एआई का उपयोग कब नहीं करना चाहिए? – उन परिस्थितियों को पहचानना जरूरी है जहां एआई का उपयोग अनुचित या हानिकारक हो सकता है।
प्रो. कपिल के अनुसार, यदि छात्र इन चार बिंदुओं को अच्छी तरह समझ लेंगे, तो वे तकनीक का अधिक प्रभावी और जिम्मेदार तरीके से उपयोग कर पाएंगे।
एआई कोई नई तकनीक नहीं है
प्रो. मनोज कपिल ने स्पष्ट किया कि बहुत से लोग एआई को हाल ही में विकसित तकनीक मानते हैं, जबकि इसका इतिहास काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि एआई की अवधारणा सबसे पहले 1956 में सामने आई थी। तब से यह तकनीक लगातार विकसित हो रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एआई ने शतरंज के विश्व चैंपियन गैरी कास्परोव को भी हराया था, जो इसकी क्षमता को दर्शाता है।
2022 के बाद जनरेटिव एआई ने बदली तस्वीर
प्रो. कपिल ने आगे बताया कि असली बड़ा बदलाव 2022 के बाद आया, जब जनरेटिव एआई का उदय हुआ। इससे पहले एआई मुख्य रूप से डेटा का विश्लेषण करने तक सीमित था, लेकिन अब यह नई सामग्री बनाने में भी सक्षम है। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार जैसे क्षेत्रों में इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
तकनीकी ज्ञान के साथ नैतिक मूल्य भी जरूरी
प्रो. कपिल ने चेतावनी दी कि अगले पांच वर्षों में तकनीक के स्तर पर बड़ा बदलाव आएगा। जो लोग एआई का उपयोग करना नहीं सीखेंगे, वे प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एआई का उपयोग करते समय नैतिक मूल्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों को तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ एआई से जुड़े नैतिक पहलुओं की भी शिक्षा दी जानी चाहिए।
उन्होंने अपने विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां एआई को सिर्फ एक विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जा रहा, बल्कि पूरे कैंपस में इसका एक इकोसिस्टम तैयार किया गया है। पिछले दो वर्षों से विश्वविद्यालय में एआई आधारित व्यवस्थाओं पर काम हो रहा है और संस्थान इस दिशा में लगभग अस्सी प्रतिशत तक सफल हो चुका है।
एआई से शिक्षा, मूल्यांकन और प्लेसमेंट में सुधार
प्रो. कपिल ने बताया कि विश्वविद्यालय में छात्रों की पढ़ाई, मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली की निगरानी एआई की मदद से की जा रही है। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि कौन छात्र तेजी से सीख रहा है, कौन धीमी गति से सीख रहा है और किसकी उपस्थिति कमजोर है।
उन्होंने यह भी बताया कि कैंपस में लगाए गए एआई-सक्षम कैमरे छात्रों की गतिविधियों का विश्लेषण कर यह संकेत देते हैं कि कौन छात्र तनाव में है और किसे काउंसलिंग या मेंटरशिप की आवश्यकता है। इसके अलावा, प्लेसमेंट प्रक्रिया में भी एआई का उपयोग किया जा रहा है, जिससे छात्रों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है।