अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय पर अलगाववाद को बढ़ावा देने का आरोप, एबीवीपी ने किया प्रदर्शन

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने बेंगलुरु स्थित अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय पर गंभीर आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के अनुसार, विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित एक कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और विभाजन को बढ़ावा देने वाला था, साथ ही इसे भारतीय सेना का अपमान बताया गया। प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय की नेमप्लेट पर काली स्याही फेंकी और दावा किया कि यह पूरी घटना भारत और कश्मीर को विभाजित करने की एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है।

प्रदर्शन के पीछे का कारण

एबीवीपी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) समर्थित संगठन स्पार्क द्वारा परिसर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा था, जो राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देता है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, इस कार्यक्रम में जम्मू और कश्मीर को भारत का हिस्सा न होने का संदेश फैलाने की कोशिश की गई। विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्र संगठन ने केंद्रीय गृह मंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई।

विश्वविद्यालय का स्पष्टीकरण

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय ने इस पूरे मामले पर एक आधिकारिक बयान जारी किया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी भी ऐसे कार्यक्रम को अधिकृत नहीं किया था, जो अलगाववाद या राष्ट्रविरोधी विचारों को बढ़ावा देता हो। बयान में कहा गया, “यह कार्यक्रम, जिसे कथित तौर पर छात्रों के एक छोटे समूह द्वारा आयोजित किया जाना था, वास्तव में हुआ ही नहीं।” विश्वविद्यालय ने परिसर में हुई अशांति और हिंसा की कड़ी निंदा की और कहा कि किसी भी कार्यक्रम के आयोजन से पहले सख्त प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

कुनान-पोशपोरा घटना का जिक्र

प्रदर्शनकारियों द्वारा साझा किए गए पोस्टर में 23 फरवरी, 1991 को हुई कुनान-पोशपोरा घटना का उल्लेख था। पोस्टर में लिखा था कि उस रात कथित सामूहिक बलात्कार की सबसे भयावह घटनाओं में से एक घटी थी। इसमें यह भी कहा गया कि 35 साल बीत जाने के बावजूद किसी भी दोषी को सजा नहीं मिली है और पीड़ित अब भी न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। एबीवीपी का आरोप था कि इस तरह के पोस्टर और कार्यक्रम के माध्यम से भारत विरोधी भावना फैलाई जा रही है।

परिसर में घुसपैठ और तोड़फोड़

विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने बयान में बताया कि 24 फरवरी की शाम करीब 6 बजे, लगभग 20 लोगों का एक समूह जबरन परिसर में घुस आया। इन लोगों ने नारेबाजी की, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और सुरक्षा गार्डों तथा छात्रों पर हमला किया। विश्वविद्यालय ने तुरंत स्थानीय पुलिस स्टेशन को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। विश्वविद्यालय ने कहा कि बाहरी समूह द्वारा मचाई गई इस हिंसा की वह कड़ी निंदा करता है।

दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप

एबीवीपी प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि जब वे कार्यक्रम का विरोध कर रहे थे, तो उन्हें परिसर के अंदर हिरासत में लिया गया और उनके साथ मारपीट की गई। एक प्रदर्शनकारी ने आरोप लगाया, “हमारे कार्यकर्ताओं को भारतीय ध्वज पकड़ने के लिए मजबूर किया गया और फिर उन पर चप्पलों से हमला किया गया।” उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के खिलाफ कार्रवाई होने तक संगठन अपना आंदोलन जारी रखेगा। वहीं, पुलिस ने बताया कि प्रदर्शनकारियों को एहतियात के तौर पर हिरासत में लिया गया है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए हैं। मामले की जांच अभी जारी है।

एबीवीपी की मांगें

एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने अपने ज्ञापन में कई प्रमुख मांगें रखीं। उन्होंने AISA और उससे जुड़े संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की। साथ ही, विश्वविद्यालय परिसर में इस तरह के राष्ट्रविरोधी कार्यक्रम आयोजित करने वाले छात्रों और नेताओं के खिलाफ गहन जांच की भी मांग की गई। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे अपना आंदोलन और तेज करेंगे।

विवाद की बढ़ती गर्माहट

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर देश में राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की बहस को हवा दे दी है। जहां एबीवीपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता से जुड़ा मामला बता रही है, वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन इसे एक गलतफहमी और अनधिकृत कार्यक्रम का परिणाम बता रहा है। फिलहाल, पुलिस मामले की जांच कर रही है और दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। इस घटना ने शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों और उनकी सीमाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।