आईआईटी में पांच साल में 65 छात्रों ने तोड़ी जान, पूर्व छात्रों ने उठाई जवाबदेही की मांग

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर में एक छात्र की हालिया आत्महत्या ने एक बार फिर देश के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले दो वर्षों में अकेले आईआईटी कानपुर में नौ छात्रों की मौत हो चुकी है, जो देशभर के सभी 23 आईआईटी परिसरों में सबसे अधिक है। यह आंकड़ा संस्थान के भीतर बढ़ते मनोवैज्ञानिक दबाव और संकट को रेखांकित करता है।

पांच वर्षों का चौंकाने वाला आंकड़ा

ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के अनुसार, जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच विभिन्न आईआईटी परिसरों में कम से कम 65 छात्रों ने आत्महत्या की। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इनमें से 30 मामले अकेले पिछले दो वर्षों में सामने आए हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि प्रतिष्ठित संस्थानों में छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ता जा रहा है और यह एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है।

नीतियां मौजूद, लेकिन सुरक्षा क्यों अपर्याप्त?

आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र (2004 बैच) और ग्लोबल आईआईटी एलुमनाई सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक धीरज सिंह ने इस संकट पर सीधे शीर्ष नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है। उनके अनुसार, पिछले दो वर्षों में आईआईटी में हुई कुल आत्महत्याओं में से लगभग 30 प्रतिशत मामले केवल आईआईटी कानपुर से हैं। उनका कहना है कि जब किसी एक संस्थान में इतनी बड़ी संख्या में छात्र आत्महत्या करते हैं, तो इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी या शैक्षणिक दबाव का परिणाम नहीं माना जा सकता। यह साफ तौर पर एक संस्थागत विफलता है।

धीरज सिंह ने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य को सुप्रीम कोर्ट जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का अभिन्न अंग मानता है, जिससे यह संस्थानों की संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाती है। उनके अनुसार, संस्थानों में नीतियां, समितियां और परामर्श केंद्र मौजूद होने के बावजूद जवाबदेही का अभाव सबसे बड़ी समस्या है। अगर देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान भी अपने छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं, तो यह संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रशासन और शासन की गंभीर नाकामी है।

क्या है समाधान?

पूर्व छात्रों का मानना है कि अब समय आ गया है कि संवेदना से आगे बढ़कर ठोस परिणाम और जिम्मेदारी तय की जाए। उन्होंने मांग की है कि संस्थानों को अपने स्तर पर एक स्पष्ट जवाबदेही तंत्र विकसित करना चाहिए, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। इसके लिए जरूरी है कि:

  • मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों को सिर्फ कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
  • छात्रों के लिए परामर्श सेवाओं को अधिक सुलभ और गोपनीय बनाया जाए।
  • शैक्षणिक दबाव को कम करने के लिए पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव किया जाए।
  • संस्थानों में एक स्वतंत्र निगरानी समिति बनाई जाए, जो छात्रों की मानसिक भलाई पर नजर रखे।

यह घटनाक्रम एक बार फिर याद दिलाता है कि शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना भी संस्थानों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। बिना ठोस कार्रवाई और जवाबदेही के, यह संकट और गहराता जाएगा।