250 रुपये से 966 करोड़ तक: नारायण मजूमदार की प्रेरक यात्रा
यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसने अभावों के बीच अपनी मंजिल खुद बनाई। जिसने सुबह-सुबह साइकिल पर दूध बेचकर अपनी पढ़ाई पूरी की और आज एक ऐसी डेयरी कंपनी के मालिक हैं जिसका सालाना कारोबार करीब 966 करोड़ रुपये है। यह सफर है नारायण मजूमदार का, जिन्होंने अपनी मेहनत और ईमानदारी के दम पर न केवल अपनी तकदीर बदली, बल्कि लाखों किसानों और युवाओं के जीवन में भी रोशनी लाई।
नारायण मजूमदार का जन्म 15 जुलाई 1958 को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता बिमलेंदु मजूमदार खेती करते थे और मां बसंती मजूमदार गृहिणी थीं। आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि वे आराम से पढ़ाई कर सकें। लेकिन नारायण ने हार नहीं मानी। 1975 में जब उन्होंने करनाल स्थित एनडीआरआई से डेयरी टेक्नोलॉजी में बीएससी करने का फैसला किया, तो सामने सबसे बड़ी चुनौती फीस की थी। उस समय दस विषयों की कुल फीस मात्र 250 रुपये थी, जो उनके परिवार के लिए एक बड़ी रकम थी।
पढ़ाई जारी रखने के लिए नारायण ने सुबह पांच से सात बजे तक दूध बेचने का काम शुरू किया। रोजाना की इस मेहनत से उन्हें करीब तीन रुपये मिलते थे। यह छोटी सी कमाई उनकी किताबों, किराए और रोजमर्रा की जरूरतों का सहारा बनी। बाद में पश्चिम बंगाल सरकार से 100 रुपये की छात्रवृत्ति मिलने लगी और पिता भी हर महीने 100 रुपये भेजने लगे। लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं था, जिसके चलते परिवार को अपनी एक एकड़ जमीन तक बेचनी पड़ी।
नौकरी से मिली सीख
डिग्री हासिल करने के बाद नारायण मजूमदार कोलकाता लौट आए और क्वालिटी आइसक्रीम नामक कंपनी में केमिस्ट के रूप में नौकरी शुरू की। उस समय 612 रुपये का मासिक वेतन सम्मानजनक माना जाता था, लेकिन उनकी दिनचर्या बेहद थकाने वाली थी। रोज सुबह जल्दी गांव से ट्रेन पकड़ना और रात देर से घर लौटना उनकी मजबूरी थी। इस एकरसता और लगातार थकान ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि केवल सुरक्षित नौकरी ही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती।
कुछ ही महीनों में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और नए अनुभवों की तलाश में निकल पड़े। इसके बाद उन्होंने सिलीगुड़ी स्थित हिमालयन कोऑपरेटिव, फिर मदर डेयरी और बाद में डैनिश डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया। हर जगह उन्हें कुछ नया सीखने को मिला, लेकिन वे कहीं ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए। उनके मन में अपना खुद का कुछ करने की बेचैनी हमेशा बनी रही।
भरोसे की नींव पर खड़ी डेयरी
1995 में नारायण मजूमदार को हावड़ा स्थित ठाकेर डेयरी प्रोडक्ट्स में कंसल्टेंट जनरल मैनेजर की जिम्मेदारी मिली। यहां काम करते हुए उन्होंने देखा कि दूध उत्पादक किसानों को उनकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलता। बिचौलियों के कारण वही दूध बाजार में कई गुना महंगा बिकता था। यह असमानता उन्हें अंदर तक झकझोर गई। उन्होंने तय किया कि वे किसानों की स्थिति सुधारने के लिए खुद पहल करेंगे।
नारायण ने गांव-गांव जाकर किसानों से सीधे संवाद शुरू किया और खुद उनसे दूध खरीदने लगे। उनकी मेहनत, ईमानदारी और जमीन से जुड़ी कार्यशैली ने किसानों का भरोसा जीत लिया। कंपनी प्रबंधन भी उनके काम से प्रभावित हुआ और उनके लिए एक चिलिंग प्लांट लगाया गया। इसके बाद 1997 में उन्होंने अपना खुद का चिलिंग प्लांट शुरू किया और 2000 में ठाकेर डेयरी की पूरी चिलिंग यूनिट खरीद ली।
रेड काउ डेयरी का जन्म
इसी दौरान नारायण ने अपने सपनों को रफ्तार देने के लिए पहला मिल्क टैंकर खरीदा। उन्होंने अपनी प्रॉपराइटरशिप फर्म को आगे बढ़ाते हुए पार्टनरशिप कॉरपोरेशन में बदल दिया। फिर साल 2003 में उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया और ठाकेर डेयरी से अलग होकर ‘रेड काउ डेयरी’ के नाम से अपनी खुद की कंपनी की नींव रखी।
आज रेड काउ डेयरी करीब 966 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाली एक मजबूत कंपनी बन चुकी है। कंपनी के तीन अत्याधुनिक प्रोडक्शन प्लांट हैं, जहां एक हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि पश्चिम बंगाल के तीन लाख से अधिक किसान इस कंपनी से सीधे जुड़े हैं और इससे स्थायी लाभ उठा रहे हैं।
सफलता का मूल मंत्र
नारायण मजूमदार की सफलता का राज सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि उनकी ईमानदारी और भरोसा है। उन्होंने हमेशा किसानों को प्राथमिकता दी और उन्हें उनकी मेहनत का सही मूल्य दिलाने की कोशिश की। उनका मानना है कि अगर हौसला सच्चा हो और मेहनत में ईमानदारी हो, तो साधन अपने आप रास्ता बना लेते हैं।
आज रेड काउ डेयरी न केवल एक सफल व्यवसाय है, बल्कि यह लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी है। नारायण मजूमदार की यह प्रेरक यात्रा बताती है कि अगर संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ते को नहीं रोक सकती। उन्होंने साबित कर दिया कि 250 रुपये की फीस से शुरू हुआ सपना आज 966 करोड़ के कारोबार में तब्दील हो सकता है, बशर्ते उसे पूरा करने का जुनून हो।