आदिवासी छात्रों के लिए बेहतर शैक्षणिक माहौल: एमपी सरकार की तीन वर्षीय योजना

मध्य प्रदेश सरकार ने आदिवासी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए एक महत्वाकांक्षी तीन वर्षीय योजना तैयार की है। इस योजना के अंतर्गत स्कूलों और छात्रावासों में बुनियादी सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया जाएगा, जिससे आदिवासी समुदाय के बच्चों को एक समान और बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सके। राज्य के जनजातीय मामलों के मंत्री कुंवर विजय शाह ने इस पहल की जानकारी देते हुए बताया कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में ठोस कदम उठाने को प्रतिबद्ध है।

शिक्षा के बुनियादी ढांचे का उन्नयन

मंत्री कुंवर विजय शाह ने एक प्रेस वार्ता में बताया कि अगले तीन वर्षों में आदिवासी छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाएगा, स्मार्ट कक्षाओं की सुविधा बढ़ाई जाएगी, तथा प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों को आधुनिक बनाया जाएगा। योजना के तहत प्रत्येक आदिवासी विकास खंड में संदीपानी स्कूल, एकलव्य स्कूल, माता शबरी बालिका शिक्षा परिसर और लड़कों के लिए मॉडल आवासीय स्कूल स्थापित किए जाएंगे।

आदिवासी संस्कृति और आजीविका को बढ़ावा

शिक्षा के साथ-साथ सरकार आदिवासी संस्कृति और आजीविका के संरक्षण पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। मंत्री ने बताया कि आदिवासी धार्मिक और पूजा स्थलों का जीर्णोद्धार किया जाएगा। इसके अलावा, आदिवासी समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए 86 आदिवासी विकास खंडों में कला केंद्र खोले जाएंगे। ये केंद्र स्थानीय कलाओं और परंपराओं को जीवित रखने में मददगार साबित होंगे।

भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग और आजीविका के अवसर

आदिवासी कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं। मंत्री ने जानकारी दी कि दिंडोरी जिले की गोंड चित्रकला को पहले ही भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्राप्त हो चुका है। साथ ही, सात अन्य उत्पादों के लिए जीआई टैगिंग की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें भील जनजाति की गुलशन माला और बोलनी, पिथोरा चित्रकला शैली, झाबुआ आदिवासी गुड़िया, और गोंड जनजाति के वाद्य यंत्र बाना चिकारा और लकड़ी के मुखौटे शिल्प शामिल हैं।

आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए, गुजरात के केवडिया में चल रहे आदिवासी महिला कैफेटेरिया की तर्ज पर पचमढ़ी, मांडू, कान्हा-किसली, पेंच और बांधवगढ़ में कैफेटेरिया का निर्माण किया जा रहा है। इन कैफेटेरिया का संचालन आदिवासी स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा किया जाएगा। इस पहल से न केवल महिलाओं को रोजगार मिलेगा, बल्कि आदिवासी संस्कृति को संरक्षित और बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी।