शिक्षा जगत में बड़े बदलावों का साल रहा 2025
बीता साल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए कई मायनों में अहम रहा। सरकारी नीतियों से लेकर तकनीकी बदलावों और छात्रों की मानसिक सेहत जैसे मुद्दों ने इस दौरान केंद्रीय भूमिका निभाई। खास तौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग और परीक्षा प्रणाली में सुधारों ने शिक्षा के स्वरूप को बदलने की दिशा में काम किया। साथ ही, छात्रों पर बढ़ते दबाव और आत्महत्या की घटनाओं ने पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए।
उच्च शिक्षा आयोग विधेयक को मिली मंजूरी
वर्ष 2025 की सबसे बड़ी खबर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) विधेयक से जुड़ी रही। इस विधेयक का उद्देश्य उच्च शिक्षा के नियमन में बड़ा बदलाव लाना है। लंबी चर्चा और विचार-विमर्श के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दे दी। अब इसे विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण (वीबीएसए) विधेयक, 2025 के नाम से जाना जाएगा। संसद के शीतकालीन सत्र में इसे पेश करने की योजना है।
इस कानून के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसे कई नियामकों को एक ही संस्था में विलय करने का प्रस्ताव है। सरकार का मानना है कि इससे नियमों की पुनरावृत्ति खत्म होगी और संस्थानों पर प्रशासनिक बोझ कम होगा। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि एक केंद्रीय नियामक के गठन से राज्यों की स्वायत्तता कम हो सकती है और स्थानीय जरूरतों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
परीक्षा प्रणाली में सुधारों पर जोर
पिछले साल परीक्षा सुधारों पर भी खासा ध्यान दिया गया। स्कूली शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक, निरंतर मूल्यांकन, परियोजना आधारित परीक्षाएं और मॉड्यूलर टेस्टिंग जैसे नए तरीकों को अपनाया जाने लगा। कई विश्वविद्यालयों ने साल के अंत में होने वाली पारंपरिक परीक्षाओं के बजाय वैकल्पिक मूल्यांकन प्रणाली पर काम शुरू किया।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने कक्षा दसवीं के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा आयोजित करने का फैसला लागू किया। वहीं, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने पिछले साल हुए पेपर लीक के मामलों के बाद राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के आधार पर प्रवेश परीक्षाओं में बड़े बदलाव किए। इन सबके बावजूद, परीक्षा का तनाव छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहा।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ी चिंता
साल 2025 में छात्रों की मानसिक सेहत से जुड़े मुद्दे काफी गंभीर हो गए। कोटा और अन्य शहरों में कोचिंग के दबाव के कारण आत्महत्या की घटनाओं ने देश को झकझोर दिया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य कर दिया। साथ ही, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर काम करने के लिए एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स का गठन किया गया।
इस टास्क फोर्स ने एक विशेष पोर्टल लॉन्च किया और देशभर में सर्वेक्षण शुरू किए। इसका मुख्य जोर कैंपस में एक समान मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाने और प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर रहा। एक संसदीय समिति ने भी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं से जुड़ी कोचिंग संस्कृति और उसके दबाव की समीक्षा करने की घोषणा की। सीबीएसई ने तथाकथित ‘डमी स्कूलों’ के खिलाफ सख्ती बढ़ाते हुए अचानक निरीक्षण शुरू किए।
शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बढ़ता दखल
बीते साल शिक्षा के क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर राज्य सरकारों के कॉलेजों तक, एआई को पढ़ाई और प्रशासन का अभिन्न अंग बनाया गया। निजी ट्यूटरिंग, स्वचालित ग्रेडिंग और पाठ्यक्रम डिजाइन में एआई का उपयोग बढ़ गया है।
शिक्षा मंत्रालय ने 2025-26 के बजट में ‘एआई फॉर एजुकेशन’ के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की घोषणा की। इसका उद्देश्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, कॉलेजों में एआई लैब बनाना और उद्योग जगत के साथ मिलकर अनुसंधान और कौशल विकास को बढ़ावा देना है। उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थानों ने एआई से जुड़ी नीतियां अपना ली हैं। जनरेटिव एआई का उपयोग शिक्षण, अनुकूली शिक्षण और प्रशासनिक कार्यों में तेजी से बढ़ रहा है।
स्कूल स्तर पर भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। स्कूल शिक्षा विभाग और एनसीईआरटी ने शुरुआती कक्षाओं से ही एआई साक्षरता और कम्प्यूटेशनल सोच को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में काम शुरू किया है। माध्यमिक कक्षाओं के लिए अलग पाठ्यपुस्तकें और ढांचा तैयार किया जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि डेटा गोपनीयता, समान अवसर और पाठ्यक्रम की गुणवत्ता जैसे नैतिक मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि एआई शिक्षा को कमजोर करने के बजाय मजबूत बना सके।