नॉर्वे का बड़ा फैसला: 13 साल तक के बच्चों के लिए स्कूलों में जनरेटिव AI पर पूर्ण प्रतिबंध
दुनिया भर में जहां एक तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपकरण के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके अंधाधुंध इस्तेमाल से बच्चों के विकास पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। इसी बीच, नॉर्वे ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए स्कूलों में छोटे बच्चों के लिए जनरेटिव AI टूल्स के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। यह फैसला शिक्षा जगत और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
नॉर्वे सरकार की ओर से जारी घोषणा के अनुसार, पहली से सातवीं कक्षा तक के छात्रों, जिनमें आमतौर पर 13 वर्ष तक के बच्चे शामिल हैं, को स्कूल परिसर में किसी भी प्रकार के जनरेटिव AI टूल का उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी। यह नियम चालू वर्ष के सितंबर माह से प्रभावी हो जाएगा। यह कदम उस समय उठाया गया है जब दुनिया के कई देश बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर सख्त नियम बना रहे हैं। इससे पहले, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण लागू करने की दिशा में कदम उठाए थे।
आखिर क्यों पड़ी AI पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत?
नॉर्वे सरकार का मुख्य तर्क है कि प्रारंभिक शिक्षा के दौरान बच्चों की बुनियादी सीखने की क्षमता को सुरक्षित रखना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। सरकार यह स्वीकार करती है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में AI पढ़ाई में सहायक हो सकता है, लेकिन शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को बिना किसी कृत्रिम सहायता के पढ़ना, लिखना और गणित के मूल सवालों को हल करना सीखना चाहिए।
कई शोधों से यह बात सामने आई है कि यदि बच्चे स्कूल में बिना किसी समझ के AI पर निर्भर हो जाते हैं, तो वे सीखने के महत्वपूर्ण चरणों से वंचित रह सकते हैं। छोटे बच्चों में अभी तक आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग) और पर्याप्त समझ विकसित नहीं होती है, जिससे वे इन उन्नत तकनीकों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग नहीं कर पाते। यही कारण है कि सरकार ने इस आयु वर्ग के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है।
बड़े बच्चों के लिए भी होंगी सख्त शर्तें
नॉर्वे का यह नियम केवल 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए ही कड़ा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे बड़े छात्रों को पूरी छूट मिल जाएगी। 13 वर्ष से अधिक उम्र के छात्र AI टूल का उपयोग तो कर सकेंगे, लेकिन उनके उपयोग पर स्कूल प्रशासन की कड़ी निगरानी रहेगी। साथ ही, शिक्षकों को AI के सही और संतुलित उपयोग के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे छात्रों का उचित मार्गदर्शन कर सकें।
उल्लेखनीय है कि नॉर्वे के स्कूलों में पहले से ही मोबाइल फोन ले जाने पर प्रतिबंध है। अब AI पर प्रतिबंध लगाने के बाद, सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह से बंद करने की योजना पर भी काम कर रही है। यह दर्शाता है कि सरकार बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास को सर्वोपरि मानती है।
कनाडा भी ले सकता है ऐसा कदम
नॉर्वे के इस सख्त रुख का असर अन्य देशों पर भी पड़ रहा है। खबरें हैं कि कनाडा भी नॉर्वे की तर्ज पर बच्चों के लिए सोशल मीडिया और AI चैटबॉट्स पर कड़ा प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। कनाडाई सरकार जल्द ही इस संबंध में एक नया कानून पेश कर सकती है। सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और AI चैटबॉट्स को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि उपयोगकर्ता हर समय उनसे जुड़े रहें। छोटे बच्चों को लगातार स्क्रीन से बांधे रखने वाली यह आदत उनकी मानसिक सेहत पर गंभीर रूप से प्रभाव डालती है, जिसे रोकना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
नॉर्वे का यह फैसला तकनीक और शिक्षा के बीच संतुलन बनाने की एक मिसाल पेश करता है। यह स्पष्ट करता है कि भले ही तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो, बच्चों के समग्र विकास के लिए पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों और मानवीय मार्गदर्शन का कोई विकल्प नहीं है।