आर्टेमिस-2: चांद के पार मानवता की सबसे बड़ी छलांग, जानें पांच अहम पहलू
पिछले पांच दशकों में मानव ने अंतरिक्ष में जितनी भी यात्राएं की हैं, वे सभी पृथ्वी की कक्षा के आसपास ही सीमित रही हैं। लेकिन अब यह परिदृश्य बदलने वाला है। नासा का महत्वाकांक्षी ‘आर्टेमिस-2’ मिशन सिर्फ चंद्रमा की यात्रा नहीं है, बल्कि यह अपोलो 13 के पुराने कीर्तिमान को पीछे छोड़ते हुए गहरे अंतरिक्ष में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह मिशन भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव भेजने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण अभ्यास साबित होने वाला है। आइए समझते हैं कि यह ऐतिहासिक अभियान किन-किन मायनों में खास है।
50 साल पुराना अपोलो 13 का रिकॉर्ड टूटेगा
आर्टेमिस-2 मिशन पर जा रहे चार अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से लगभग 4,06,773 किलोमीटर दूर तक जाएंगे। यह दूरी मानव द्वारा अंतरिक्ष में सबसे दूर जाने का नया रिकॉर्ड स्थापित करेगी। इससे पहले यह कीर्तिमान 1970 में अपोलो 13 मिशन के नाम था, जिसने 4,00,171 किलोमीटर की दूरी तय की थी। आर्टेमिस-2 इस आंकड़े को लगभग 2,500 किलोमीटर से अधिक कर देगा, जो मानव अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में एक बड़ी छलांग होगी।
चंद्रमा के पार गहरे अंतरिक्ष की यात्रा
यह मिशन 7 अप्रैल 2026 को भारतीय समयानुसार रात 12:15 बजे चंद्रमा के अत्यंत निकट से गुजरेगा, जिसे ‘लूनर फ्लाईबाय’ कहा जाता है। इस यात्रा के दायरे को समझने के लिए बस इतना जान लीजिए कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पृथ्वी से मात्र 400 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगाता है, जबकि चंद्रमा हमसे लगभग 3,84,633 किलोमीटर दूर है। आर्टेमिस-2 का अंतरिक्ष यान न केवल चंद्रमा तक पहुंचेगा, बल्कि उसके उस अंधेरे हिस्से का भी चक्कर लगाएगा जो पृथ्वी से कभी दिखाई नहीं देता। इससे भी आगे बढ़कर, यह यान चंद्रमा के पार उस गहरे अंतरिक्ष में प्रवेश करेगा, जहां पिछले पचास वर्षों में कोई भी इंसान नहीं पहुंचा है।
इंजन फेल होने पर भी सुरक्षित वापसी की गारंटी
आर्टेमिस-2 जिस विशेष मार्ग पर यात्रा कर रहा है, उसे वैज्ञानिक भाषा में ‘फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी’ कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि अंतरिक्ष यान पृथ्वी पर लौटने के लिए चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग करेगा। इसे अपने इंजन को चालू करने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण इसे एक गुलेल की तरह वापस पृथ्वी की ओर फेंक देगा। यह तकनीक मिशन की सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि किसी तकनीकी खराबी के कारण ओरियन अंतरिक्ष यान का मुख्य इंजन बीच रास्ते में काम करना बंद भी कर दे, तब भी यह मार्ग अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करेगा।
गहरे अंतरिक्ष के विकिरण का सामना
पृथ्वी से लगभग 2,000 किलोमीटर ऊपर जाने के बाद हमारे ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र अपनी सुरक्षा कवच खो देता है। यह चुंबकीय क्षेत्र ही हमें सूर्य और ब्रह्मांड से आने वाले हानिकारक विकिरण से बचाता है। आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्रियों को इस खतरनाक ब्रह्मांडीय विकिरण का सीधा सामना करना होगा। इस मिशन का एक प्रमुख उद्देश्य यह अध्ययन करना है कि इस विकिरण-युक्त वातावरण में मानव शरीर और अंतरिक्ष यान पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह जानकारी भविष्य में लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
वापसी में रफ्तार का नया इतिहास
जब ओरियन अंतरिक्ष यान अपनी यात्रा पूरी करके पृथ्वी के वायुमंडल में वापस प्रवेश करेगा, तो उसकी गति एक नया रिकॉर्ड बनाएगी। यह यान लगभग 40,200 किलोमीटर प्रति घंटा की अविश्वसनीय गति से पृथ्वी की ओर लौटेगा। आज तक कोई भी मानवयुक्त अंतरिक्ष यान इतनी तेज गति से वापस नहीं आया है। इस भीषण गति के कारण वायुमंडल में भारी घर्षण उत्पन्न होगा, जिससे अंतरिक्ष यान की हीट शील्ड को लगभग 2,760 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सहन करना होगा। यह तापमान सूर्य की सतह के तापमान का लगभग आधा है, जो इस मिशन की चुनौती और महत्व दोनों को दर्शाता है।