ऑक्सफोर्ड अध्ययन: मेंटल हेल्थ पर सोशल मीडिया का अलग-अलग असर

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या सभी प्लेटफॉर्म हमारी मानसिक सेहत पर एक जैसा असर डालते हैं? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘वेलबीइंग रिसर्च सेंटर’ द्वारा किए गए एक नए अध्ययन ने इस सवाल का जवाब दिया है। ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ के तहत प्रकाशित इस शोध में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जो सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर हमारी सोच को बदल सकते हैं।

कनेक्टिविटी बनाम एल्गोरिदम का दबदबा

शोध के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को दो प्रमुख श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म आते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपस में जोड़ना है। अध्ययन में पाया गया कि इन प्लेटफॉर्म का अधिक उपयोग करने वाले लोग अपने जीवन से अधिक संतुष्ट और खुश महसूस करते हैं। खासकर व्हाट्सएप का उपयोग करने वालों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं काफी कम देखी गईं।

दूसरी ओर, एक्स (पूर्व में ट्विटर), इंस्टाग्राम और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम-आधारित कंटेंट पर काम करते हैं। यहां उपयोगकर्ता ज्यादातर दूसरों के पोस्ट और वीडियो देखने में समय बिताते हैं, जिसे पैसिव स्क्रॉलिंग कहा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि इन प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से नकारात्मकता, तनाव और मानसिक परेशानियां काफी बढ़ जाती हैं। इंस्टाग्राम के मामले में तो यह भी सामने आया कि यह लोगों के जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को नकारात्मक बना सकता है।

संतुलित उपयोग है सबसे बेहतर विकल्प

शोध के संपादक प्रोफेसर जन-इमैनुएल डी नेवे का कहना है कि सोशल मीडिया के साथ गोल्डीलॉक्स सिद्धांत अपनाना चाहिए, यानी न बहुत ज्यादा और न ही बहुत कम। अध्ययन में पाया गया कि जो लोग दिन में लगभग एक घंटा या उससे कम सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, वे उन लोगों की तुलना में अधिक खुश रहते हैं जो इसे बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं करते। रिसर्च के अनुसार, बहुत अधिक या बिल्कुल कम उपयोग दोनों ही सही नहीं हैं। संतुलित उपयोग ही सबसे अच्छा विकल्प है।

भीड़ का हिस्सा बने रहने की मजबूरी

रिपोर्ट में एक कड़वी सच्चाई यह भी सामने आई है कि अधिकतर लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बाकी सब लोग वहां मौजूद हैं। लोग जानते हैं कि अगर वे इसका उपयोग कम कर दें या बंद कर दें, तो वे ज्यादा बेहतर महसूस करेंगे, लेकिन अकेले छूट जाने के डर के कारण वे इससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। यह सामाजिक दबाव और FOMO का एक खतरनाक चक्र बन गया है, जो लोगों को इन प्लेटफॉर्म से बांधे रखता है।

बच्चों पर पड़ रहा गंभीर असर

हाल ही में प्रकाशित ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026’ में साफ कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अत्यधिक उपयोग बच्चों में अवसाद और जीवन के प्रति असंतोष पैदा कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जो किशोर दिन में 5 घंटे से अधिक समय फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, एक्स या स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं, उनमें डिप्रेशन और बेचैनी के लक्षण उन बच्चों की तुलना में कहीं अधिक देखे गए हैं जो इनका सीमित उपयोग करते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अब सिर्फ एक व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गई है, बल्कि पूरी आबादी के मानसिक स्वास्थ्य के ग्राफ को नीचे गिरा रही है।

2010 के बाद से बढ़ा सोशल मीडिया का दौर

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 के आसपास स्मार्टफोन के आगमन के बाद मोबाइल डेटा और ब्रॉडबैंड इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा। इंटरनेट की इस क्रांति ने ही सोशल मीडिया के दौर की शुरुआत की। विशेष रूप से पश्चिमी देशों और अंग्रेजी बोलने वाले क्षेत्रों में 25 साल से कम उम्र के युवाओं में सोशल मीडिया का उपयोग तेजी से बढ़ा। इस दौरान कम उम्र के युवाओं की जीवन संतुष्टि में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई। यह आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी प्रगति के साथ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

कैसे बढ़ती है सोशल मीडिया से समस्या?

शोध में यह भी पाया गया कि लगातार बिना किसी इंटरैक्शन के स्क्रॉल करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिक नुकसानदायक है। वहीं दोस्तों से बातचीत या सीमित उपयोग का असर कम नकारात्मक होता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिदम आधारित कंटेंट लगातार उपयोगकर्ताओं को बांधे रखता है। इनमें यूजर्स को लगातार एक ही तरह का कंटेंट दिखाया जाता है।

एल्गोरिदम द्वारा दिखाए जाने वाले वीडियो और फोटो उन्हें हर वक्त यह अहसास कराते हैं कि वे दूसरों से पीछे हैं। इससे उपयोगकर्ता दूसरों से अपनी तुलना करने लगता है और उनकी चमक-धमक वाली लाइफस्टाइल देखकर उसके मन में खुद के प्रति हीन भावना जन्म ले लेती है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे लोगों में कम आत्मसम्मान, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं पैदा करती है।

इस अध्ययन से स्पष्ट है कि सोशल मीडिया का हमारी मानसिक सेहत पर एक जैसा प्रभाव नहीं पड़ता। कुछ प्लेटफॉर्म हमें जोड़ते हैं और खुशी देते हैं, जबकि कुछ हमें तनाव और नकारात्मकता की ओर ले जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम अपने सोशल मीडिया उपयोग को समझदारी से चुनें और संतुलित तरीके से इस्तेमाल करें।