अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स का जमावड़ा: केसलर सिंड्रोम का बढ़ता खतरा

धरती की निचली कक्षा में सैटेलाइट्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे वैज्ञानिकों में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। हाल ही में स्पेसएक्स द्वारा 10 लाख सैटेलाइट भेजने के प्रस्ताव ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो अंतरिक्ष में भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसे केसलर सिंड्रोम के नाम से जाना जाता है।

स्पेसएक्स का विशाल प्रस्ताव

30 जनवरी 2026 को एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने अमेरिकी नियामक संस्था फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन के समक्ष एक अभूतपूर्व प्रस्ताव रखा। कंपनी ने अंतरिक्ष में डेटा सेंटर संचालित करने के लिए अधिकतम 10 लाख सैटेलाइट्स का एक मेगा-कॉन्स्टेलेशन स्थापित करने की अनुमति मांगी है। ये सभी सैटेलाइट्स धरती की निचली कक्षा में 500 से 2,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किए जाएंगे। खास बात यह है कि इनमें से कुछ सैटेलाइट्स ऐसी कक्षाओं में होंगे जहां उन्हें लगभग लगातार सूर्य का प्रकाश मिलता रहेगा। फिलहाल इस प्रस्ताव पर आम जनता से राय मांगी गई है।

पहले से भरी पड़ी है कक्षा

फरवरी 2026 तक लगभग 14,000 सक्रिय सैटेलाइट्स पहले से ही कक्षा में मौजूद हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि भविष्य के लिए 12 लाख से अधिक नए सैटेलाइट्स की योजना बनाई गई है। इनमें से ज्यादातर संचार सैटेलाइट्स हैं, जिनका उद्देश्य धरती पर इंटरनेट और जीपीएस जैसी सेवाएं प्रदान करना है। इन सैटेलाइट्स की औसत आयु केवल पांच वर्ष होती है। कंपनियां इन्हें लगातार बदलने और बढ़ाने की योजना बनाती हैं, जिससे अंतरिक्ष में औद्योगिक गतिविधि स्थायी रूप लेती जा रही है।

प्रकाश प्रदूषण का बढ़ता संकट

लो-अर्थ ऑर्बिट में मौजूद ट्रक के आकार के ये सैटेलाइट्स सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं, जिससे वे रात में चलते हुए तारों जैसे दिखाई देते हैं। 2021 में खगोलशास्त्रियों ने अनुमान लगाया था कि एक दशक से भी कम समय में रात के आसमान की हर 15 रोशनियों में से एक सैटेलाइट होगी। उस समय केवल 65,000 सैटेलाइट प्रस्तावित थे। यदि यह संख्या लाखों में पहुंचती है, तो प्रकाश प्रदूषण कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे खगोलीय अवलोकन और प्राकृतिक रात्रि दृश्य दोनों प्रभावित होंगे।

केसलर सिंड्रोम: एक भयावह संभावना

अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर सैटेलाइट्स भेजने से टकराव का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में 10 सेंटीमीटर से बड़े मलबे के 50,000 से अधिक टुकड़े अंतरिक्ष में तैर रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सैटेलाइट्स ने खुद को बचाने की कोशिश बंद कर दी, तो हर 3.8 दिनों में एक बड़ी टक्कर होने की संभावना है। इस स्थिति को ‘केसलर सिंड्रोम’ कहा जाता है, जिसमें एक टक्कर से निकले मलबे के कारण दूसरी टक्करें होने लगती हैं, और यह श्रृंखला पूरी कक्षा को कचरे का ढेर बना सकती है।

ओजोन परत और पर्यावरण पर प्रभाव

सैटेलाइट्स को लॉन्च करने में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन जलता है, जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा, जब ये सैटेलाइट्स पुराने होकर वायुमंडल में जलते हैं, तो वे धातु के महीन कण छोड़ते हैं। ये कण हानिकारक रासायनिक प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकते हैं, जिससे धरती का रक्षा कवच कही जाने वाली ओजोन परत कमजोर हो सकती है। यह सीधे तौर पर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है।

वैज्ञानिकों का सुझाव: डार्क स्काई इम्पैक्ट असेसमेंट

इस बढ़ते खतरे को रोकने के लिए विशेषज्ञ ‘डार्क स्काई इम्पैक्ट असेसमेंट’ की मांग कर रहे हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया होगी जो किसी भी बड़े सैटेलाइट प्रोजेक्ट को मंजूरी देने से पहले उसके प्रभावों की जांच करेगी। इस प्रक्रिया में खगोलविदों, पर्यावरणविदों और आम जनता की राय ली जाएगी। इसके तहत यह देखा जाएगा कि सैटेलाइट्स की भीड़ से आसमान की दृश्यता और मलबे के खतरे पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कंपनियों को मजबूर किया जाएगा कि वे सैटेलाइट्स की चमक कम करें और कम से कम संख्या में लॉन्चिंग करें।

यह कोई वीटो पावर नहीं, बल्कि एक ऐसा तरीका होगा जिससे विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा। यदि समय रहते कड़े नियम नहीं बनाए गए, तो अंतरिक्ष का यह कचरा हमारे भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएगा।