संवाद 2026: अमर उजाला मंच पर देवी चित्रलेखा ने सफलता की नई परिभाषा बताई, सार्थकता पर दिया जोर

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आयोजित अमर उजाला संवाद 2026 कार्यक्रम में अध्यात्म जगत की प्रसिद्ध वक्ता देवी चित्रलेखा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ‘सतत विकास’ थीम पर केंद्रित इस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीय संस्कृति, संस्कारों और आध्यात्मिक जीवन जीने की कला पर गहन चर्चा की। उत्तराखंड के विकास से लेकर देश से जुड़े अहम मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

सफलता की आधुनिक परिभाषा पर सवाल

देवी चित्रलेखा ने ‘सुप्रभात देवभूमि’ के साथ सत्र की शुरुआत करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में अध्यात्म का अर्थ केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अच्छे संस्कारों, सही विचारों और जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा जीवन दो प्रकार का होता है – एक सफल जीवन और दूसरा सार्थक जीवन।

आज के दौर में सफलता को नाम, प्रसिद्धि और धन से जोड़कर देखा जाता है। सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या को भी लोग सफलता का पैमाना मानने लगे हैं। देवी चित्रलेखा ने कहा कि सफल जीवन आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सार्थक जीवन है। उन्होंने कहा कि भगवान ने हमें यह अनमोल मानव जीवन किसी उद्देश्य के लिए दिया है। जिस व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है, उसके भीतर आनंद स्वतः दिखाई देता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार विद्यालय में छुट्टियों के दौरान विद्यार्थियों को कार्य दिया जाता है, कुछ लोग उसे समय पर पूरा करके आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ उसे टाल देते हैं और पीछे रह जाते हैं। ठीक उसी तरह भगवान ने हमें इस संसार में एक अवसर देकर भेजा है।

ईश्वर के दो प्रश्न

देवी चित्रलेखा ने कहा कि जब मनुष्य इस संसार को छोड़कर ईश्वर के पास जाएगा, तब भगवान उससे दो महत्वपूर्ण प्रश्न करेंगे। पहला प्रश्न होगा – मैंने तुम्हें इतना अनमोल जीवन दिया, क्या तुमने इसे आनंद के साथ जिया? उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में सच्चा आनंद आ जाता है, उसका जीवन अपने आप सार्थक बन जाता है।

दूसरा प्रश्न होगा – जो आनंद तुम्हें मिला, क्या तुमने उसे दूसरों के साथ बांटा? यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर हां में होगा, तभी भगवान को लगेगा कि उन्होंने मनुष्य को जीवन देकर सही निर्णय लिया। वे उस व्यक्ति से प्रसन्न होंगे।

मानव जीवन और भारत का सौभाग्य

गंगा दशहरा की शुभकामनाएं देते हुए देवी चित्रलेखा ने कहा कि हमें अपने जीवन को केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य जैसा जन्म, भारत जैसा देश और सनातन जैसा धर्म मिलना अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। इससे अधिक भाग्यशाली स्थिति और कुछ नहीं हो सकती।

उन्होंने आगे कहा कि हमारे पास सबसे बड़ी पूंजी हमारा शरीर और यह मानव जीवन है, इसलिए इसकी महत्ता को समझना जरूरी है। आज के समय में लोग धन कमाने की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि जीवन के अनमोल रिश्तों और अपनों के लिए समय ही नहीं बचता। इंसान पैसे कमाने निकल जाता है और जब तक धन आता है, तब तक बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है। कई बार बच्चों के साथ बैठने का समय नहीं मिलता और जब समय मिलता है, तब बच्चे खुद अपनी जिंदगी की दौड़ में निकल चुके होते हैं।

दान के विविध रूप

देवी चित्रलेखा ने कहा कि कमाई करना जरूरी है, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि समाज से जो कुछ हमें मिला है, उसके प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना भी उतना ही आवश्यक है। जीवन की हर चीज को केवल धन के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस संसार में दान के कई रूप हैं, जैसे:

  • कन्यादान
  • अन्नदान
  • रक्तदान
  • सेवा

उन्होंने कहा कि रक्तदान केवल शरीर से दिया जाने वाला दान ही नहीं है, बल्कि दूसरों के जीवन में खुशी और उत्साह भरना भी एक तरह का रक्तदान है। एक महापुरुष की वाणी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति खुश रहता है, तो उसके शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। इसलिए हमें प्रतिदिन कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे सामने वाला प्रसन्न हो, लोगों के जीवन में आनंद आए और हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आए। यही जीवन की सच्ची सार्थकता है।

बांटने का गुण

संवाद को आगे बढ़ाते हुए देवी चित्रलेखा ने कहा कि मनुष्य अपने जीवन के अधिकांश गुण दूसरों से सीखता है, लेकिन एक गुण ऐसा है जो व्यक्ति को स्वयं अपनाना होता है और वह है दूसरों की सहायता करना तथा अपने हिस्से की खुशियां बांटना। उन्होंने कहा कि जीवन की वास्तविक सुंदरता इसी बात में है कि हम अपने पास मौजूद अच्छाइयों को दूसरों के साथ साझा करें।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज गंगा और यमुना पूजनीय इसलिए मानी जाती हैं, क्योंकि वे बिना किसी भेदभाव के निरंतर सबको देती रहती हैं। उनका स्वभाव केवल बांटना है और यही कारण है कि उन्हें सम्मान और श्रद्धा मिलती है। देवी चित्रलेखा ने कहा कि जो व्यक्ति बांटना जानता है, वही वास्तव में मधुर स्वभाव वाला होता है और समाज में वही सबसे अधिक सम्मान पाता है।