पितरों की मुक्ति का विशेष अवसर: तीन वर्षों में आने वाली अधिकमास श्राद्ध अमावस्या

हिंदू पंचांग में अधिकमास का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इसे पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है और इसका संबंध भगवान विष्णु से माना जाता है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है, जिससे इस दौरान पड़ने वाली अमावस्या भी अत्यंत खास हो जाती है। मान्यता है कि इस दिन किए गए पूजा-पाठ, तर्पण और श्राद्ध कर्मों से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध अमावस्या कब है?

इस वर्ष तिथियों के विशेष संयोग के कारण अधिकमास की अमावस्या और श्राद्ध अमावस्या अलग-अलग दिनों में पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, अधिकमास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 14 जून को दोपहर 12:19 बजे से शुरू होकर 15 जून की सुबह 08:23 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर अमावस्या 15 जून को मानी जाएगी, लेकिन उस दिन श्राद्ध कर्म करना संभव नहीं होगा।

किस दिन किए जाएंगे श्राद्ध, तर्पण और अन्य कर्म?

पितरों का श्राद्ध सामान्यतः दोपहर के समय, लगभग 11 बजे के बाद किया जाता है। 15 जून को अमावस्या तिथि सुबह ही समाप्त हो रही है और इसके बाद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा शुरू हो जाएगी। ऐसे में उस दिन श्राद्ध करना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता। वहीं 14 जून को अमावस्या तिथि दोपहर में प्रारंभ हो रही है, इसलिए इसी दिन श्राद्ध अमावस्या मानी जाएगी और पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और अन्य कर्म किए जा सकते हैं।

पिंडदान और ब्राह्मण भोज का समय

जो लोग इस दिन पिंडदान, ब्राह्मण भोजन या अन्य धार्मिक अनुष्ठान करना चाहते हैं, वे 14 जून को दोपहर 12:19 बजे के बाद इन कार्यों की शुरुआत कर सकते हैं। बेहतर होगा कि ये सभी कार्य दोपहर 02:30 बजे तक पूर्ण कर लिए जाएं, क्योंकि यह समय श्राद्ध के लिए शुभ माना गया है।

तर्पण की विधि

तर्पण की विधि भी इस दिन विशेष महत्व रखती है। स्नान के बाद अमावस्या तिथि में हाथ में जल और काले तिल लेकर कुशा के माध्यम से पितरों को तर्पण देना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुशा के बिना किया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुंचता, बल्कि अन्य अतृप्त आत्माएं उसे ग्रहण कर लेती हैं।

अमावस्या का महत्व

श्राद्ध अमावस्या का महत्व अत्यंत गहरा है। मान्यता है कि इस दिन पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपनी संतानों से तर्पण व श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। जब उन्हें संतुष्टि मिलती है, तो वे अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और उन्नति का आशीर्वाद देते हैं। वहीं, जो लोग इस दिन पितरों का सम्मान नहीं करते, उन्हें पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है।

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