गाजियाबाद के सीवेज में मिला पोलियो वायरस: क्या भारत पर फिर मंडरा रहा है खतरा?
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सीवेज के नमूनों में वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस टाइप-1 (VDPV1) पाए जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। यह वही वायरस है जो बच्चों में लकवा पैदा कर सकता है। भारत को 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आधिकारिक रूप से पोलियो मुक्त घोषित किया गया था। इससे पहले 13 जनवरी 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में पोलियो का अंतिम मामला दर्ज किया गया था। ऐसे में यह खबर चिंता का विषय बन गई है।
पोलियो वायरस का नमूना कैसे मिला?
स्वास्थ्य विभाग पोलियो वायरस की निगरानी के लिए नियमित रूप से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) से पानी के नमूने जांच के लिए भेजता है। हाल ही में गाजियाबाद के डूंडाहेड़ा एसटीपी से भेजे गए नमूने की जांच में वीडीपीवी टाइप-1 की पुष्टि हुई है। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने तुरंत अलर्ट जारी कर दिया।
शहरी क्षेत्र के 12 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 107 टीमों का गठन किया गया है। ये टीमें घर-घर जाकर पांच साल तक के बच्चों का स्वास्थ्य सर्वे करेंगी। सर्वे के दौरान बच्चों की टीकाकरण स्थिति की भी जांच की जाएगी और जरूरत पड़ने पर उन्हें पोलियो की खुराक पिलाई जाएगी। विशेष रूप से एसटीपी के आसपास की कॉलोनियों में इस अभियान पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
क्या भारत फिर से पोलियो की चपेट में आ सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सीवेज के नमूने में वायरस मिलने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पोलियो महामारी फिर से फैल गई है। यह एक संकेत है कि वायरस का संचार कहीं न कहीं हो रहा है और इस पर निगरानी रखना आवश्यक है। वर्तमान में दुनिया में पोलियो केवल दो देशों – पाकिस्तान और अफगानिस्तान – में सक्रिय है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय यात्रा, टीकाकरण कवरेज में कमी और वायरस के बदलते स्वरूप के कारण अन्य देशों में भी खतरा बना रहता है।
यह भी संभावना है कि नियमित टीकाकरण न होने के कारण कुछ बच्चों में यह वायरस पनप रहा हो। वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस तब उत्पन्न होता है जब कमजोर टीके का वायरस लंबे समय तक कम प्रतिरक्षा वाले समुदाय में घूमता रहता है और उत्परिवर्तित होकर खतरनाक रूप ले लेता है।
पोलियो रोग और इसके खतरे
पोलियो एक अत्यधिक संक्रामक रोग है जो मुख्य रूप से फीकल-ओरल रूट से फैलता है। इसका मतलब है कि संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित पानी या भोजन के सेवन से वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है।
- संक्रमित व्यक्ति के मल में वायरस कई सप्ताह तक मौजूद रह सकता है, इसलिए सीवेज निगरानी को पोलियो नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
- यह वायरस नर्वस सिस्टम पर हमला कर स्थायी रूप से लकवा पैदा कर सकता है।
- सबसे अधिक खतरा पांच साल से कम उम्र के बच्चों को होता है।
- कई बार संक्रमित व्यक्ति में कोई गंभीर लक्षण नहीं दिखते, जिससे वायरस चुपचाप फैलता रहता है।
- खराब स्वच्छता व्यवस्था और साफ पेयजल की कमी वाले क्षेत्रों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
पोलियो से बचाव के उपाय
पोलियो से बचाव के लिए टीकाकरण सबसे प्रभावी और विश्वसनीय तरीका है। भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों को पोलियो की मुफ्त खुराक नियमित रूप से पिलाई जाती है। ‘दो बूंद जिंदगी के’ अभियान ने भारत को पोलियो मुक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही पोलियो का कोई मामला सामने न आए, फिर भी टीकाकरण कार्यक्रम को जारी रखना आवश्यक है। टीकाकरण कवरेज में थोड़ी सी भी कमी वायरस को दोबारा फैलने का मौका दे सकती है।
इसके अलावा, व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है:
- साफ पानी पिएं और खाने से पहले हाथ धोएं।
- शौच के बाद साबुन से हाथ धोने की आदत डालें।
- बच्चों को स्वच्छ वातावरण प्रदान करें।
- सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखें और जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाएं।
स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां
गाजियाबाद में वायरस मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तेजी से काम शुरू कर दिया है। 107 टीमों को घर-घर भेजा जा रहा है। ये टीमें न केवल बच्चों का स्वास्थ्य सर्वे करेंगी, बल्कि उनके टीकाकरण की स्थिति की भी जांच करेंगी। जिन बच्चों ने टीका नहीं लगवाया है, उन्हें तुरंत पोलियो की खुराक पिलाई जाएगी।
यह कदम वायरस के संभावित प्रसार को रोकने के लिए उठाया गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि यह एक सतर्कता का उपाय है, घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन लोगों को अपने बच्चों का टीकाकरण अवश्य कराना चाहिए और स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।
पोलियो वायरस के खिलाफ लड़ाई में भारत ने 15 साल की कड़ी मेहनत से जो सफलता हासिल की है, उसे बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयासों की जरूरत है। यह घटना एक चेतावनी है कि हमें अपनी सतर्कता में कोई कमी नहीं आने देनी चाहिए।